मानव जीवन का परम लक्ष्य आत्मिक शांति पाना है । जो लोग इस परम लक्ष्य तक पहुंच जाते हैं उसी में रमण करते हैं जिनके लिए अन्य कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता जिनका प्रागट्य मात्र लोक कल्याण के लिए होता है और जिनकी प्रीति परमात्मा में होती है । ऐसे महापुरुषों के संपर्क में आने वाली जड़ वस्तुएं भी पूजनीय बन जाती हैं । श्रुति कहती है:
कुलम पवित्रम जननी कृतार्था । वसुंधरा पुण्यवती च येन ।।
अर्थात जिस कुल में भी महापुरुष होते हैं कुल पवित्र हो जाता है जिस माता के गर्भ से उनका जन्म होता है वह भाग्यशाली जननी कृतार्थ हो जाती है और जहाँ उनकी चरण रज पड़ती है वह वसुंधरा भी पुण्यवती हो जाती है ।
कहा जाता है कि ऐसे अलमस्त फकीर कभी-कभी तथा कहीं-कहीं मिलते हैं परंतु इस भारत भूमि का तो यह सौभाग्य ही रहा है कि यहाँ अति प्राचीन काल से लेकर ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण होता ही रहा है । आज भी ऐसे महान संतों से यह भारत वंचित नहीं है । यह समस्त मानव जाति के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहाँ कभी श्रीराम और श्रीकृष्ण अवतरित हुए तो कभी कबीर और नानक कभी मीरा एवं मदालसा ने अपने दिव्य जीवन से लोगों का पथ-प्रदर्शन किया तो कभी स्वामी रामतीर्थ स्वामी विवेकानंद ने लोगों को आध्यात्म का अमृत पिलाया । परम पूज्य संत श्री आशाराम जी महाराज भी संतों की ऐसी मनोहर पुष्पमाला में खिले हुए एक सुविकसित पुष्प हैं । जिनके पावन प्रेरक मार्गदर्शन में लाखों-लाखों लोग ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चल कर अपना जीवन धन्य कर रहे हैं ।
संसार के त्रिविध तापों से तप्त हृदयों को आत्मिक शान्ति से आल्हादित करने वाले पूज्य श्री का जन्म पावन सिंधु नदी के तट पर बसे नवाबशाह जिले के बेराणी नामक गांव के नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरूमलानी के घर १७ अप्रैल, सन्र १९४१ तदनुसार चैत्र वद छठ संवत १९९४ को हुआ । बाल्यावस्था में ही आप के मुख मंडल के तेज़, नेत्रों की दिव्य चमक तथा अद्भुत क्रिड़ाओं को देखकर उनके कुलगुरु ने पिताश्री थाऊमलजी के सम्मुख यह भविष्यवाणी कर दी थी:
ज्ञानी वैरागी पूर्व का तेरे घर में आए । जन्म लिया है योगी ने पुत्र तेरा कहलाए ।।
पावन तेरा कुल हुआ जननी कोख कृतार्थ । नाम अमर तेरा हुआ पूर्ण चार पुरुषार्थ ।।
यह बालक कोई साधारण बालक नहीं, वरन पूर्व जन्म का योगी है । बड़ा होकर यह महान संत तथा लाखों का तारणहार बनेगा ।
श्री थाऊमलजी के कुलगुरु श्री परशुराम जी की वर्षों पुरानी भविष्यवाणी आज हमारे सामने अक्षरशः चरितार्थ हो रही है । पश्चिमी भोगवादी को कुसंस्कारों के दुष्प्रभाव से प्रभावित होकर पतन की घोर अंधकार में रात्रि में प्रवेश करते हुए आज के समाज को ऐसे महापुरुषों की अत्यंत आवश्यकता है । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे घोर कलयुग में भी ऐसी दिव्य विभूतियों का प्रकट होना संभव है ? श्रुति तथा संत कहते हैं कि यह संभव है पूज्य बापूजी कहते हैं प्रत्येक नारी में महापुरुष को जन्म देने की क्षमता होती है बस आवश्यकता है तो सत्संग सेवा एवं साधना द्वारा क्षमता को विकसित करने की । हमारे शास्त्रों ने भी कहा है कि कर्तव्यनिष्ठ धर्म परायण तथा भगवान एवं संत में श्रद्धा रखने वाले धर्म प्रेमियों के घर महान आत्माओं का अवतरण होता है । इस बात की पुष्टि के लिए हमारे समक्ष कई महापुरुषों के जीवन चरित्र उदाहरण रूप है ।
सत्यनिष्ठा धर्मपरायण एवं गुरु वशिष्ठ जी के श्री चरणों में श्रद्धा-भाव रखने वाले राजा दशरथ के घर तो भगवान स्वयं ही अवतरित हो गए ।
महान भक्त इन मीराबाई के जीवन में भी उनकी माता की कृष्ण भक्ति का प्रभाव रहा ।
हिरण्यकश्यप जैसे राक्षस के घर में प्रहलाद जैसे भक्तों का जन्म सत्संग के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण है प्रहलाद की माता कयाधु जब गर्भवती थी तब नारद जी के आश्रम में रहती थी तथा श्रद्धा पूर्वक सत्संग सुना करती थी ।