मनुष्य का बचपन वह दर्पण है जिसमें उसके भावी व्यक्ति को देखने की झलक मिल जाती है । विश्व के महापुरुषों की जीवनी से यह स्पष्ट झलकता है कि उनका बाल्यकाल किस प्रकार से पूर्ण अनुशासित, सुसंस्कृत तथा आत्मसम्मान से परिपूर्ण था । उनमें साहस, आत्मविश्वास, धैर्य एवं संवेदना की ऐसी उदात्त भावनाएँ थी जिन्होंने उन्हें महापुरुष बना दिया । इसके विपरीत अपराधी प्रवृत्तिवाले मनुष्यों की जीवनी को देखें तो पता चलता है कि उनका बाल्यकाल भी कई प्रकार की कुण्ठाओं से ग्रस्त एवं अव्यवस्थित था ।
बच्चे भावी समाज की नींव होते हैं । जिस प्रकार की नींव होती है उसी के अनुरूप भवन की मजबूती भी होती है । यदि नींव ही कमजोर हो तो उस पर भव्य-भवन का निर्माण कैसे हो सकता है ?
प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे एक सभ्य समाज की कड़ी बनें तथा उनका एवं स्वयं का नाम उज्ज्वल करें । फिर यह सब कैसे हो ? इसके लिए माता-पिता के त्याग, परिश्रम एवं अथक प्रयास व लगन की आवश्यकता होती है ।
परिवार बच्चे की वह प्राथमिक पाठशाला है, जहाँ से उसके जीवनरूपी भव्य-भवन की नींव बनती है । बच्चा जो भी सीखता है, वही उसके संस्कार बन जाते हैं । बच्चा एक कोमल डाल के समान होता है । जैसे माली कोमल डाल को अपनी इच्छा के अनुरूप मोड़ लेता है तथा आगे चलकर वह डाल उसी रूप में एक विशाल वृक्ष का आकार ले लेती है, उसी प्रकार अपने बच्चे के जीवन को किस दिशा की ओर ले जाना है ? यह माता-पिता के हाथ में होता है ।
माता-पिता के लिए यह अति आवश्यक हो जाता है कि वे अपने से बड़ों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसे व्यवहार की अपेक्षा वे अपने बच्चों से रखते हैं । जो बच्चे बाल्यकाल से ही टी.वी.-सिनेमा देखने तथा अश्लील साहित्य पढ़ने में रूचि रखने लगते हैं, उनका जीवन पतनोन्मुख हो जाता है । क्योंकि बार-बार टी.वी. पर मार-काट के दृश्य एवं अश्लील गाने देखने से बालक के कोमल मस्तिष्क पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ता है ।
जिस घर में एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष तथा ईर्ष्या आदि का प्रभाव होता है उस घर के बच्चे भी उसी प्रवृत्ति के हो जाते हैं । इसलिए बच्चों को सुसंस्कृत करने के लिए माता-पिता तथा परिवार का सुसंस्कृत होना अति आवश्यक है ।
फिल्म, गंदे साहित्य तथा बहिर्मुखता के कारण बच्चे भारतीय संस्कृति से विमुख होकर अपने जीवन को निम्न स्तर का बना लेते हैं, इसलिए उन्हें इस प्रदूषण से बचाने के लिए माता-पिता को बचपन से ही अपने बच्चों को सत्शास्त्रों के अध्ययन के प्रति जागरुक करना चाहिए । इससे बच्चों के जीवन में दैवी गुणों का प्रभाव होता है, वहाँ से दुर्गुण स्वतः ही दूर भागने लगते हैं । वे माता-पिता तो धनभागी हैं जिन्होंने अपनी जीवन नैया को किसी समर्थ सद्गुरु के हांथों में सौंपा है । ऐसे माता-पिता को अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सुसंस्कार देने हेतु अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता है क्योंकि उनका सत्संगमय जीवन ही उनकी संतान के लिए एक आदर्श संस्कार बन जाता है । ऐसे बच्चे आगे चलकर मीरा, गार्गी, गुरू नानक, संत कबीर, स्वामी विवेकानंद, संत ज्ञानेश्वर, संत अमरदास, संत एकनाथ एवं संत तुकाराम की नाईं होकर पूजनीय हो जाते हैं ।
सत्संग प्रेमी जीजाबाई, बालक शिवा को बचपन से ही वीरता की कहानियाँ सुनाया करती थीं । वही शिवा आगे चलकर क्षत्रपति शिवाजी कहलाए, जिन्होंने पराक्रम से मुगलों के दांत खट्टे कर दिये । बच्चों के भविष्य निर्माण में माता-पिता का प्रमुख योगदान होता है इसलिए माता-पिता का सत्शास्त्र-सत्संग प्रेमी तथा सदाचारी होना आवश्यक है ।