बच्चों का मन बड़ा कोमल और ग्रहण शील होता है । उस आयु में पड़नेवाले संस्कार अमिट हो जाते हैं । बड़े हो जाने के बाद इन संस्कारों को बदलना या मिटाना सरल नहीं होता । रोते बच्चों को चुप करने के लिए अक्सर माता–पिता यही कहा करते हैं कि ‘देखो हौआ… चुप हो जा, नहीं तो तुझे उसके हाथों पकड़वा देंगे’, ‘भूत आ जायेगा’ आदि । ऐसी सब बातें बड़ी आपत्तिजनक होती हैं । इस भांति भय के वातावरण में पले शिशु बड़े होने पर बहुत ही डरपोक और कायर बनते हैं । बच्चों के मन में सदा साहस और उत्साह भरना चाहिए ।
पाश्चात्य देशों में शिक्षक छात्रों को युद्ध के चित्र दिखाया करते हैं और कहते हैं कि ‘यह देख बच्चे ! नेपोलियन का यह चित्र देख, कैसा बहादुर है ! तू भी बड़ा होकर बड़ा सेनापति बनना ।’ इससे बच्चों के मन में बचपन से ही वीरता की वृत्ति पनपने लगती है । बड़े होने पर उनके ये संस्कार बाह्य प्रोत्साहन पा के और भी अधिक बलवान होते हैं । जब वे लोग बच्चों में वीरता, उत्साह बढ़ाने के लिए ऐसा कर सकते हैं हम अपने बच्चों में भारतीय संस्कृति के दिव्य संस्कार भरने के लिए इस कुंजी का सदुपयोग क्यों नहीं कर सकते ! बच्चों में जैसे संस्कार भर दिए जाते हैं, उसी दिशा में उनका जीवन मुड़ जाता है । अतः उन्हें ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों, वीरों आदि के श्रीचित्र दिखा के बोलें : ‘ देख बेटे ! तू ऐसा ही सद्गुणी, ब्रह्मज्ञानी, वीर बनेगा… बन के रहेगा । शाबाश ! हिम्मत कर ! ॐ ॐ असंभव कुछ नहीं है । ॐकार मंत्र सारी दुर्बलता–विफलता को कुचलने में समर्थ है । जिनमें उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये ६ सद्गुण विकसित हों, उन्हें पद–पद पर अंतरात्मा की शक्ति व सहायता मिलती रहती है ।
ॐ ॐ ॐ… पद–पद पर अंतर्यामी प्रभु की सहायता मिलती रहेगी । कभी दीनता–हीनता, पलायनता के विचारों को अपने चित्त में फटकने मत दो लाल ! ॐ ॐ प्रभुजी… ॐ ॐ साहस… ॐ ॐ आनंद ॐ…’ विषाद व हीन विचार, प्रमाद आदि दुर्गुणों को भगाने के लिए भगवन्नाम लेते हुए ताली बजाते हुए दोनों हाथ ऊपर करके जो हास्य–प्रयोग किया है वह बच्चों को सिखाओ । इससे वे सद्गुणी बनेंगे, जीवन के परम लक्ष्य परमात्मप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होंगे ।