कुछ माता-पिता अपने बच्चे को खूब लाड़-लड़ाते हैं वे सोचते हैं कि बेटे को बढ़िया स्कूल में पढ़ायेंगे, पायलट बनायेंगे । इसके लिए बच्चे को छात्रावास में भी रखते हैं किंतु बच्चा ऐसा हो जाता है कि न घर में रहता है, न छात्रावास में रहता है, न पायलट बनता है, वरन् फुटपाथी हो जाता है । ऐसे बच्चों को मैं जानता हूँ ।
कुछ माँ-बाप बच्चों को खूब रोकते टोकते हैं, क्योंकि माँ-बाप जैसा चाहते हैं बच्चे वैसा नहीं कर पाते । बच्चों की अपनी उमंगे हैं, अपनी ख्वाहिशें हैं, ज्यादा टोकाटाकी से बच्चा बेचारा भीतर ही भीतर सिकुड़ता रहता है । फिर वह छुपकर गलती करता है और उसमें बेईमानी करने की आदत पनपती है ।
कभी माता-पिता की टोकाटाकी हितकारक होती है तो कभी गड़बड़ी कर देती है । माता-पिता या कुटुम्बी के लिए उचित है कि वे बच्चे को इतना विश्वास में लें कि बच्चा कोई गलती करे तो अपने कुटुम्बी को बता दें । गलती जानकर उसको ज्यादा टोकें नहीं, गलती का मूल खोजें तथा उस मूल को हटा दें, बच्चा फिर गलती नहीं करेगा ।
बालक पैदा होता है तब से लेकर 7 साल तक उसका मूलाधार केन्द्र विकसित होता है । इन 7 सालों तक बालक बीमार न हो, इसकी सावधानी बरतें । 2-3 साल का होने पर साल में एक बार 3-4 दिन पपीता और उसके बीज खिलायें ताकि उसका पेट ठीक रहे ।
बालक इधर-उधर की चीजें खाता है, भोजन के समय ठीक से नहीं खाता तो आगे चलकर उसका पाचनतंत्र खराब हो जायेगा । माता-पिता को चाहिए कि खान-पान में ज्यादा लाड़ न लड़ायें व खान-पान की सलाह किसी वैद्य या जानकार से लें ।
7 से 14 वर्ष की उम्र में स्वाधिष्ठान केन्द्र विकसित होता है । अगर इस उम्र में ध्यान न दिया गया तो उसमें गंदी भावनाएँ और गंदी आदतों वाले बच्चों के संस्कार पड़ेंगे । इस समय वह जैसा देखेगा और जैसी भावनाएँ उसके चित्त में आ गयीं वे सब उसे जीवन भर नचाती रहेंगी । माता-पिता के लिए उचित है कि उसकी अच्छी भावनाओं का पोषण करें तथा बुरी भावनाओं को निकालने के लिए प्रोत्साहित करें लेकिन दबाव न डालें ।
14 से 21 साल तक मणिपुर केन्द्र विकसित होता है । उन दिनों में संयम-पालन, सूर्यनमस्कार आदि करने से वासनाओं, भावनाओं के आवेग में यह भय-चिंता में बच्चों से जो गलतियाँ होती हैं उन पर वे स्वयं नियंत्रण पा सकते हैं और बुद्धिपूर्वक अच्छे इरादे से कर्म करके ऊँचे उठ सकते हैं ।
भ्रूमध्य को अनामिका से हलका-सा रगड़ते हुए ʹૐ गं गणपतये नमःʹ, ʹૐ गुरुभ्यो नमःʹ जपकर तिलक करें । फिर 2-3 मिनट प्रणाम की मुद्रा में सिर जमीन पर लगाकर रखें । इससे निर्णयशक्ति, बौद्धिक शक्ति में जादुई लाभ होता है । क्रोध, आवेश, वैरभाव पर नियंत्रण पाने वाले रसों का भीतर विकास होता है ।
शवासन में आत्मिक शक्तियाँ खींचकर पाँचों शरीरों में लाने की व्यवस्था है । बाह्य शरीर का मोटा हो जाना, वांछनीय नहीं है, मजबूत हो जाना वांछनीय है । बाह्य शरीर के साथ प्राणमय शरीर भी विकसित होना चाहिए । प्राणबल कमजोर है, मनोबल कमजोर है तो दूसरे के प्राणबल व मनोबल के आगे आपका मन सिकुड़ जायेगा । आपकी विचारशक्ति कमजोर है तो दूसरा आपको पटा लेगा । अतः बालक के पाँचों शरीर विकसित हों इस पर ध्यान दें ।
“बापू जी ! बच्चे बहुत परेशान करते हैं । क्या करें ?”
ज्याद टोके नहीं किंतु उस उछलकूद को वे सुव्यवस्थित कर सकें-ऐसा उपाय करें । ज्यादा टोकेंगे तो वह छुपकर करेगा अथवा उसका मन दब जायेगा या विरोधी हो जायेगा । इस तरह उसका हित चाहते हुए भी आप अनजाने में अहित कर बैठते हैं ।
बच्चे चंचल हैं तो उन्हें ज्यादा न रोकें-टोकें । उनकी यह अवस्था ही है उछलकूद करने की । माता-पिता ज्यादा रोकेंगे-टोकेंगे तो उनके मन में माता-पिता के लिए जो आदर, मान और स्नेह होना चाहिए, वह नहीं होगा । 12 साल के दिमागवाले को बलात् 60 सालवाले जैसा रहने-करने के लिए कहें तो उसके लिए वैसा कर पाना सम्भव नहीं है ।
“क्या बच्चा जैसा करना चाहे, उसे करने दिया जाये ?”
हाँ, कुछ तो करने दिया जाय और कुछ मोड़ दिया जाय । अगर अत्यन्त अऩुचित करता है तो दबाव से अनुचित छोड़े इसकी अपेक्षा सुझाव से छोड़े – ऐसा प्रयत्न करना चाहिए ।
ʹचाय न पियो….. कॉफी न पियो….ʹ ऐसा कहने की जगह उससे कहोः ʹकेवल दूध पियो ।ʹ इनकार की अपेक्षा बच्चे को मोड़ने की कला माता-पिता को सीखनी चाहिए ।
ʹतेरे में यह कमी है, यह कमी है….ʹ ऐसा करके आप अनजाने में बच्चे के साथ जो जुल्म करते हैं, वह न करें । बच्चे में आपको 100 अवगुण दिखते हैं, ऐसे ही उसमें कोई-न-कोई सदगुण भी तो होगा । जो गुण है उसकी प्रशंसा करें, उसका उत्साह बढ़ायें । फिर उसमें जो कमी है उसके प्रति थोड़ी-सी ग्लानि पैदा करा दें, ʹबेटा ! ऐसा तुझे शोभा नहीं देता । तू चाहे तो इस कमी को निकाल सकता है ।ʹ इस तरह अपनी कमी के प्रति मन में ग्लानि आने से वह स्वयं ही उसे निकाल देगा ।
लोग बोलते हैं, यह उन्नति का युग है । मैं बोलता हूँ कि युवान-युवतियों के लिए ऐसा पतन का युग जो अभी चल रहा है कभी नहीं आया । बच्चों और युवावर्ग पर बड़ा जुल्म हो रहा है । उनका शरीर मजबूत नहीं हो रहा है, मनोबल विकसित नहीं हो रहा है एवं बुद्धिबल सूक्ष्मता की यात्रा नहीं कर रहा है ।
अतः बच्चे को सुबह-शाम 10-10 प्राणायाम करवाने चाहिए, सूर्यनमस्कार करवाने चाहिए । आश्रम से प्रकाशित ʹदिव्य प्रेरणा-प्रकाशʹ ग्रंथ का अध्ययन-मनन करना तथा इसमें दिये हुए निर्देशों के अनुसार अपने को ढालने का प्रयत्न करना चाहिए ।
जग में शांति लानी है, खुशियाँ लानी हैं तो ऋषि-पद्धति से शिक्षण की आवश्यकता है । इस पद्धति का उपयोग करके आप संतान को ओजस्वी-तेजस्वी अवश्य बना सकते हैं ।