इसके बिना उन्नति हो ही नहीं सकती

इसके बिना उन्नति हो ही नहीं सकती संयम वह साधना है जिससे शक्तिरूपी सिद्धि सुलभ है । संयम शक्ति का कोष है । आत्मसंयम से ही सर्वत्र विजय मिलती है । जो मन-इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखता है, विद्वानों ने Read more…

शिक्षा का उद्देश्य

कैसी हो शिक्षा ? बच्चे ही भविष्य के स्रष्टा हैं । वे ही भावी नागरिक हैं । वे ही राष्ट्र के भाग्य-विधायक हैं । उन्हें शिक्षित करो, अनुशासित करो, उचित ढाँचे में डालो । प्रत्येक बच्चे के भीतर उत्साह व Read more…

कैसे बन सकते हैं उत्तम ?

आप जो भी हों, जानिये कैसे बन सकते हैं उत्तम ?   बाल्यावस्था वही उत्तम है   जो निरर्थक क्रीडाओं एवं संगदोषवश व्यसन-वासनाओं की पूर्ति में भ्रष्ट न होकर विद्याध्ययन में सार्थक हो ।  युवावस्था वही उत्तम है  जिसकी शक्ति Read more…

क्यों जरूरी है संयम का पालन ?

क्यों जरूरी है संयम का पालन ? ऋषि पहले से ही ब्रह्मचर्य से होने वाले लाभों के बारे में बता चुके हैं । ब्रह्मचर्य से होने वाले लाभों को अब आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है । यू.के. के Read more…

दिव्य प्रेरणा-प्रकाश क्या है ?

दिव्य प्रेरणा-प्रकाश क्या है ? युवा पीढ़ी में संयम-सदाचार, ब्रह्मचर्य, मातृ-पितृभक्ति, देशभक्ति, ईश्वरभक्ति, कर्तव्यपरायणता आदि सद्गुणों का विकास हो – इस उद्देश्य से देशभर में ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश ज्ञान प्रतियोगिता’ का विद्यालयों-महाविद्यालयों में आयोजन किया जाता है । इस प्रतियोगिता में Read more…

आत्महत्याः कायरता की पराकाष्ठा

आत्महत्याः कायरता की पराकाष्ठा मृत्यु एक ईश्वरीय वरदान है, फिर भी यदि कोई आत्महत्या करता है तो वह महापाप है । परमात्मा ने हमें यह अमूल्य मानव चोला दिया है तो हमारा कर्तव्य है कि हम इसे साफ सुथरा रखें, Read more…

समय अभाव का बहाना क्यों ?

आगे से समय अभाव का बहाना न बनाना अपनी आत्मा मस्ती में मस्त रहने वाले एक महात्मा थे । एक दिन उनके पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा जीवन अल्पकाल का है, इसे थोड़े समय में क्या-क्या करूं ? Read more…

ऊँची पढ़ाई या तुच्छ पढ़ाई ?

किसको कहते हैं ऊँची पढ़ाई और तुच्छ पढ़ाई ? जिनके जीवन का लक्ष्य ऊँचा नहीं है वे हलकी इच्छाओं में, हलके दिखावों में, हलके आकर्षणों में खप जाते हैं । जीवन का कोई ऊँचा ध्येय बना लेना चाहिए और ऊँचे Read more…

देवी–देवताओं के स्वरुप विविध क्यों

देवी-देवताओं के स्वरुप विविध क्यों ? देवी-देवताओं के अलग-अलग रूप व उनकी विविध वेशभूषा उनके विशिष्ट गुण दर्शाते हैं । भगवान विष्णुजी सृष्टि के पालनकर्ता होने से चतुर्भुज रूप हैं । प्रलायकर्ता होने से भगवान शंकरजी का तीसरा नेत्र अग्निस्वरूप Read more…