घर-घर में बहे प्रेम की गंगा

घर-घर में बहे प्रेम की गंगा मेरठ (उ.प्र.) में रामनारायण व जयनारायण नाम के दो भाई रहते थे । उनकी एक छोटी बहन थी – प्रेमा । उनके माता-पिता स्वर्गवासी हो गये थे । बड़े भाई रामनारायण जमींदार थे और Read more…

नौकरी… आवश्यकता या शौक ?

नारी और नौकरी आजकल अपने यहाँ की शिक्षित स्त्रियोंको नौकरियोंका बड़ा चस्का लग रहा है । इस सम्बन्धमें पाश्चात्यों का क्या अनुभव है, इसे भी देख लेना चाहिये । प्रथम महायुद्धके पहले पाश्चात्य देशोंमें भी बड़े घरों की स्त्रियों के Read more…

नाराजगी क्यों और किससे

अपने से नाराज हुए बिना दूसरे से नाराजगी सम्भव नहीं एक परिवार में तीन बहुएँ थीं । बड़ी बहू की कोई कितनी ही सेवा करे पर वह हमेशा मुँह फुलाये रहती थी । मँझली बहू किसी आत्मवेत्ता गुरु की शिष्या थी Read more…

जीवन जीने की कला

जीने-मरने की कला प्रत्येक मनुष्य को जीवन जीने की कला सीख लेनी चाहिए और मौत आये उसके पहले मरने की कला भी सीख लेनी चाहिए । जो जीवन जीने की कला नहीं सीख पाता है वह जीवन भर भारी दुःख Read more…

सुखमय जीवन का महामंत्र

जब सास बन गयी माँ… दशरथ जी अपने चारों पुत्रों का विवाह करा के बहुओं को लेकर घर पहुँचे, उसके बाद कौशल्याजी तथा अन्य लोग जो जनकपुर नहीं गये थे, वे दशरथजी के श्रीमुख से विवाह की वार्ता सुनकर गदगद Read more…

क्या है सदगृहस्थों के लक्षण ?

सद्गृहस्थों के आठ लक्षण सदगृहस्थों के लक्षण बताते हुए महर्षि अत्रि कहते हैं कि अनसूया, शौच, मंगल, अनायास, अस्पृहा, दम, दान तथा दया – ये आठ श्रेष्ठ विप्रों तथा सदगृहस्थों के लक्षण हैं । यहाँ इनका संक्षिप्त परिचय दिया जा Read more…

ब्रह्मचर्य पालन के नियम

ब्रह्मचर्य-पालन के नियम ऋषियों का कथन है की ब्रह्मचर्य ब्रह्म-परमात्मा के दर्शन का द्वार है, उसका पालन करना अत्यंत आवश्यक है । इसलिए यहाँ हम ब्रह्मचर्य-पालन के कुछ सरल नियमों एवं उपायों की चर्चा करेंगे : ब्रह्मचर्य तन से अधिक मन Read more…

सच्चे आभूषण

वस्त्रालंकारो से नहीं, चरित्र से पड़ता प्रभाव स्वामी रामतीर्थ जी का विवाह बचपन में ही हो गया था । यद्यपि वे गृहस्थ जीवन के प्रति उदासीन थे फिर भी उन्हें कुछ समय के लिए गृहस्थ जीवन बिताना पड़ा था । Read more…

स्नेह है मधुर मिठास

स्नेह है मधुर मिठास सारी सृष्टि का आधार है सर्वव्यापक परमेश्वर और उसकी बनायी इस सृष्टि का नियामक, शासक बल है स्नेह, विशुद्ध प्रेम । निःस्वार्थ स्नेह सत्य, धर्म, कर्म सभी का श्रृंगार है अर्थात् ये सब तभी शोभा पाते Read more…

सौंदर्य का उद्गम

सौंदर्य, शक्ति और कर्मण्यता के पीछे कौन है ? यह सौंदर्य या शोभा, चेष्टा, सजीवता और उत्साह क्या वस्तु है ? क्या वह आँख, कान या नाक के कारण है ? नहीं, नेत्र-कान इत्यादि में तो वह प्रकट होती है Read more…