विवेक की धनी- कर्मावती

विवेक की धनीः कर्मावती यह कथा सत्यस्वरूप ईश्वर को पाने की तत्परता रखनेवाली, भोग-विलास को तिलांजलि देने वाली, विकारों का दमन और निर्विकार नारायण स्वरुप का दर्शन करने वाली उस बच्ची की है जिसने न केवल अपने को तारा, अपितु Read more…

शक्ति स्वरुपा माँ आनंदमयी

शक्तिस्वरूपा माँ आनंदमयी संयम में अदभुत सामर्थ्य है । जिसके जीवन में संयम है, जिसके जीवन में ईश्वरोपासना है । वह सहज ही में महान हो जाता है । आनंदमयी माँ का जब विवाह हुआ तब उनका व्यक्तित्व अत्यंत आभासंपन्न Read more…

कैसा हो अपना हस्तलेखन ?

कैसा हो अपना हस्तलेखन ? कहते हैं, अपना हस्तलेखन अंतर्मन का दर्पण होता है । उसे सुंदर बनाने के लिए लेखन के नियमों का पालन जरूरी है और यह अभ्यास कुछ अंश में मन को भी अनुशासित करता है । Read more…

साध्वी सिरमा

साध्वी सिरमा सिंहल देश (वर्तमान श्रीलंका) के एक सदाचारी परिवार में जन्मी हुई कन्या सिरमा में बाल्यकाल से ही भगवदभक्ति प्रस्फुटित हो चुकी थी । वह जितनी सुन्दर थी, उतनी ही सुशील भी थी । 16 वर्ष की उम्र में Read more…

भक्तिमती जनाबाई

भक्तिमती जनाबाई भगवान कब, कहाँ और कैसे अपनी लीला प्रकट करके भक्तों की रक्षा करते हैं, यह कहना मुश्किल है ! भक्तों का इतिहास देखते हैं, उनका चरित्र पढ़ते हैं तब भगवान के अस्तित्व पर विशेष श्रद्धा हो जाती है Read more…

मीराबाई की गुरुभक्ति

मीराबाई की गुरुभक्ति भक्तिमती मीराबाई का एक प्रसिद्ध भजन हैः पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे । लोग कहें मीरा भई रे बावरी, सास कहे कुलनासी रे । बिष को प्यालो राणाजी भेज्यो, पीवत मीरा हाँसी रे । मैं तो Read more…

मुक्ताबाई का सर्वत्र विठ्ठल दर्शन

मुक्ताबाई का सर्वत्र विट्ठल-दर्शन श्रीनिवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर एवं सोपानदेव की छोटी बहन थी मुक्ताबाई । जन्म से ही चारों सिद्ध योगी, परम विरक्त एवं सच्चे भगवदभक्त थे । बड़े भाई निवृत्तिनाथ ही सबके गुरु थे । नन्हीं सी मुक्ता कहतीः “विट्ठल ही Read more…

रतनबाई की गुरुभक्ति

रतनबाई की गुरुभक्ति गुजरात के सौराष्ट्र प्रान्त में नरसिंह मेहता नाम के एक उच्चकोटि के महापुरुष हो गये । वे जब भजन गाते तो श्रोतागण भक्तिभाव से सराबोर हो उठते थे । दो लड़कियाँ नरसिंह मेहता की बड़ी भक्तिन थीं Read more…

वेणाबाई की गुरुनिष्ठा

वेणाबाई की गुरुनिष्ठा एक बार समर्थ रामदासजी मिरज गाँव (महाराष्ट्र) पधारे । वहाँ उन्होंने किसी विधवा कन्या को तुलसी के वृंदावन (गमले) के पास कोई ग्रंथ पढ़ते देख पूछा : “कन्या! कौन-सा ग्रंथ पढ़ रही हो?” “एकनाथी भागवत ।” “ग्रंथ Read more…

संत गवरीबाई का प्रेरणादायी जीवन

संत गवरीबाई का प्रेरणादायी जीवन और वचन संवत् १८१५ में डूँगरपुर (प्राचीन गिरिपुर) गाँव (राज.) में एक कन्या का जन्म हुआ,नाम रखा गया गवरी । ५-६ साल की उम्र में ही उसका विवाह कर दिया गया । विवाह के एक Read more…