रजोदर्शन के समय कैसे रहना चाहिए ?
स्त्री-शरीर में जो मलिनता होती है वह प्रति मास रजस्राव के द्वारा निकल जाती है और वह स्त्री पवित्र हो जाती है । शास्त्रो में कहा गया है कि रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिए । उसे सबसे अलग, किसीकी नजर न पड़े ऐसे स्थान में बैठना चाहिये । चौथे दिन स्नान करके पवित्र होकर ही अन्य कार्य करने चाहिए ।
रजस्वला होने के समय जितना इन्द्रिय-संयम, हलका भोजन तथा विलासिता का अभाव होगा उतनी ही स्त्रीशोणित की शक्ति कम होगी । रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक केवल एक बार भोजन करना, जमीन पर सोना, संयत रहना चाहिये । घी-दूध का सेवन नहीं करना चाहिये, गहने इत्यादि नहीं पहनने चाहिये और अग्नि को स्पर्श नहीं करना चाहिये । चतुर्थ दिन वस्त्र सहित स्नान करना चाहिये ।
देखा गया है कि घर में पापड़ बनते हो और रजस्वला स्त्री उसको देख ले तो पापड़ लाल हो जाते हैं । कुछ लोग इसको वहम मानते हैं परंतु यह वैज्ञानिक सत्य है ।
अमेरिका के प्रो. शीक ने ये प्रामाणिक किया है कि रजस्वला स्त्री के शरीर में सीस कोई प्रबल विष होता है कि वह जिस बगीचे में चली जाती है उस बगीचे के फूल-पत्ते आदि सुख जाते हैं, पौधे मर जाते हैं । फल सड़ जाते हैं । यहाँ तक कि वृक्षों में कीड़े तक भी पड़ जाते हैं ।
खांड के एक कारखाने में रजस्वला स्त्री को प्रवेश कराया गया । बाद में निरीक्षण किया गया तो मालूम पड़ा कि खांड घटिया हो गई थी ।
अतः रजस्वला स्त्री के दर्शन से दूर रहना उसके और अपने स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हितकर है । जहाँ दर्शन और स्पर्श निषिद्ध है वहाँ उसके हाथ के बनाये हुए भोजन की तो बात ही कहाँ रही ?
रजोदर्शन के दिनों में स्त्री को कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है ।
नियम :
१. ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे उदर (पेट) को अधिक हिलाना पड़े या उस पर दबाव पड़े । जल का घड़ा उठाना, देर तक अकड़ू बैठना, दौड़-भाग करना, जोर से हँसना या रोना, झगड़ा करना या ज्यादा घूमना-फिरना, गाना-बजाना, शोक, दुख या कामभाव बढ़ानेवाले दृश्य देखना या ऐसी कामुक पुस्तकें पढ़ना, ये सब हानिकारक हैं ।
२. उदर और कमर को ठंडा लगे ऐसा काम नहीं करना चाहिये । कमर तक जल में डूबकर स्नान नहीं करना चाहिये । मस्तक में गर्मी मालूम पड़े तो ठंडा तेल लगाना और भीगे अंगोछे से शरीर पोंछना हानिकारक नहीं है ।
३. रजोदर्शन के समय का रक्त एक प्रकार का विष है । इस विष संसर्ग में आई हुई चीजों को भी विष के समान ही समझकर त्याग कर देना चाहिये ।
४. जब तक रक्तस्राव होता हो तब तक ‘पति का संग’ तो भूलकर भी न करना चाहिये । इन दिनों में पति का दर्शन भी निषिद्ध बतलाया गया है ।
५. रजस्वला स्त्री यदि दिन में सोये और कदाचित् उसे उसी ऋतुकाल में गर्भ रह जाय तो भावी शिशु अति सोनेवाला उत्पन्न होगा । काजल लगाने से अँधा, रोने से विकृत दृष्टि, स्नान और अनुलेपन से शरीर पीड़ावाला, तेल लगाने से कुष्ठी, नख काटने से कुनखी, दौड़ने से चंचल, हँसने के काले दाँत, काले ओष्ठ तथा विकृत जिव्हा और तालुवाला, बहुत बोलने से बकवादी, बहुत सुनने से बहरा, कंघी से बाल खींचने पर गंजा, अधिक वायु–सेवन से तथा परिश्रम करने से पागल पुत्र उत्पन्न होता है । इसलिए रजस्वला स्त्री इन कार्यो को न करे । इन शास्त्रीय नियमों का पालन न करने से ही अनिच्छित सन्तानें होती हैं । अतः इच्छित व् तेजस्वी सन्तान चाहनेवालों को गर्भाधान संस्कार के नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए ।
ये नियम साधारण से हैं पर इनका पालन कसरनेवाली स्त्री स्वस्थ और सुखी रहती है । इनका पालन न करनेवाली स्त्री को निश्चय ही बीमारी एवं दुखी होना पड़ता है । ऐसी स्त्री न केवल खुद के लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए नर्क का निर्माण करती है ।