अपने ही बच्चे की गर्भ में नृशंस हत्या करवाने से शरीर रोगों का घर बन जाता है और परिवार कलह, अशांति की भीषण ज्वालाओं में झुलसने लगता है । प्रसवकाल में माँ के शरीर को जितना खतरा होता है, उससे दुगुना खतरा उसे गर्भपात करवाने से होता है । पाराशर स्मृति (4.20) में आता है –
यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने ।
ब्रह्महत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात करने से लगता है ।
गर्भ में शिशु को अपने पूर्व जन्मों का भी स्मरण रहता है । इसीलिए गर्भस्थ शिशु को शास्त्रों में ऋषि की संज्ञा दी गई है । गर्भस्थ शिशु हत्या करने से ऋषि हत्या का पाप लगता है । अतः इस घोर पाप से स्वयं भी बचें व औरों को भी बचाने में सहभागी बनें ।
“गर्भपात संतान के विनाश के साथ पुण्याई तो नष्ट करता ही है, साथ ही माता के स्वास्थ्य का भी विनाश करता है । अतः दवाइयों या कातिल साधनों से अपने निर्दोष शिशु के टुकड़े करवाकर घातक बीमारियों के शिकार और महापाप का भागी बनना कहाँ तक उचित है ?”
– पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
“गर्भस्थ शिशु को अनेक जन्मों का ज्ञान होता है इसलिए श्रीमद् भागवत में उसको ऋषि (ज्ञानी) कहा गया है । गर्भपात यह कितना बड़ा पाप है ! रावण और हिरण्यकशिपु के राज्य में भी गर्भपात जैसा महापाप नहीं हुआ था ! आज यह महापाप नहीं हुआ था । आज यह महापाप घर-घर हो रहा है । यदि माँ ही अपनी संतान का नाश कर दे तो फिर किससे रक्षा की आशा करें ?”
– स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज
अतः सभी पवित्र आत्माओं और देश के जागरुक नागरिकों से अनुरोध है कि इस अभियान का प्रत्येक क्षेत्र में प्रचार-प्रसार करें तथा इस भयानक पाप के भागीदार न स्वयं बनें न दूसरों को बनने दें । महिला उत्थान मंडल द्वारा गर्भपात व सिजेरियन डिलेवरी को रोकने के लिए गर्भपात रोको सेमिनार लगाये जाते हैं जिसमें अनुभवी डॉक्टरों तथा विशेषज्ञों द्वारा गर्भपात से होनेवाली हानियों तथा उससे बचने के उपायों की जानकारी दी जाती है । गर्भपात व सिजेरियन डिलीवरी से सावधान के पैम्फ्लेट्स व फ्लैक्स आदि जनसेवा में बाँटकर गर्भपात न कराने का संकल्प करवाया जाता है ।