भारतीय संस्कृति विश्व की महान संस्कृतियों में से एक है, अनेकों रीति-रिवाजों, संस्कारों, परम्पराओं, पर्वों-त्योहारों आदि से आलंकृत है । इन सभी के पीछे हमारे ऋषि-मनीषियों का गूढ़ आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण है । जिसके कारण ये सभी अपना विशिष्ट महत्व रखते हैं । पर्वों की इसी श्रृंखला में से एक है रक्षाबंधन का त्योहार जो कि श्रावण मास की पूनम (नारियली पूनम) को मनाया जाता है । इस दिन बाँधा जानेवाला रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुंज है । यह सूत्र यदि वैदिक रीति से बनाकर भगवद्भाव व शुभ संकल्पों सहित बाँधा जाय तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है ।
भविष्य पुराण में लिखा है :
सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम् । सकृत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत् ॥
‘इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है । इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्षभर मनुष्य रक्षित हो जाता है ।’ सदा से ही हमारी संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम् का भाव रहा है, इसी शुभभाव की अभिव्यक्ति महिला उत्थान मंडल की बहनें प्रतिवर्ष आत्मविकास का परिचायक रक्षाबंधन महोत्सव मनाकर करती हैं ।
भद्राकाल में राखी बाँधने से तन, मन और धन तीनों की हानि होती है । अतः भूलकर भी भद्राकाल के समय रक्षासूत्र न बाँधें ।