“जकारः जन्मविच्छेद पकारः पापनाशकः।
तस्माद् जप इति प्रोक्त जन्म पाप विनाशक: ॥”
‘ज’से जन्म-मरण का नाश होता है और ‘प’ से पाप का नाश होता है इसीका-नाम है जप । इसलिए जन्म और मरण के पापों का, दु:खों का नाश करने के लिए खूब जप करना चाहिए ।
नारी घर-परिवार की नींव होती है । यदि नारी संस्कारवान, नियमनिष्ठ, ईश्वरपरायण है तो परिवार में सुख-शांति, भक्ति का माहौल बना रहता है, बच्चों में भी संयम-सदाचार, भक्ति के संस्कार आने लगते हैं । नारी ऐसे ही संस्कारों से संस्कारवान हो, आश्रम के पवित्र आध्यात्मिक वातावरण में सत्संग-जप, ध्यान कर’स्व की ओर’ अग्रसर हो तथा अपने घर-परिवार का भी आध्यात्मिक विकास करे, इस उद्देश्य से यह 3, 5, व 7 दिवसीय कार्यक्रमों (camps) का आयोजन किया जाता है ।
“नारी ! तू नारायणी है । देवी ! सत्संग, जप, परमात्मा-ध्यानसे अपनी छुपी हुई शक्तियों को जाग्रत कर ।
संयम-साधना द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचान ।”
नारी शक्ति का जागरण तब होगा ।
‘स्व की ओर‘ जब नारी का पग होगा ।।
आत्मप्रभा को हे नारी अब विकसित कर ।
जप–ध्यान कर आत्मबल को खुद में भर ।।