भगवान श्रीराम के वियोग तथा रावण और राक्षसियों के द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों के कारण माँ सीता अशोक वाटिका में बड़ी दुःखी थीं । न तो वे भोजन करतीं न ही नींद । दिन-रात केवल श्रीराम-नाम के जप में ही तल्लीन रहतीं । उनका विषादग्रस्त मुखमंडल देखकर हनुमान जी ने पर्वताकार शरीर धारण करके उनसे कहाः “माँ ! आपकी कृपा से मेरे पास इतना बल है कि मैं पर्वत, वन, महल और रावणसहित पूरी लंका को उठाकर ले जा सकता हूँ । आप कृपा करके मेरे साथ चलें और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का शोक दूर करके स्वयं भी इस भयानक दुःख से मुक्ति पा लें ।”
भगवान श्रीराम में ही एकनिष्ठ रहने वाली जनकनंदिनी माँ सीता ने हनुमानजी से कहाः “हे महाकपि ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ, साथ ही तुम्हारे हृदय के शुद्ध भाव एवं तुम्हारी स्वामी-भक्ति को भी जानती हूँ । किंतु मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती । पतिपरायणता की दृष्टि से मैं एकमात्र भगवान श्रीराम के सिवाय किसी परपुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती । जब रावण ने मेरा हरण किया था तब मैं असमर्थ, असहाय और विवश थी । वह मुझे बलपूर्वक उठा लाया था । अब तो करुणानिधान भगवान श्रीराम ही स्वयं आकर, रावण का वध करके मुझे यहाँ से ले जाएँगे ।”